सेंटर फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स एंड सेक्युलरिज्म (सीपीडीआरएस) की अखिल भारतीय समिति राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) की धारा 3(2) के अंतर्गत दिल्ली पुलिस आयुक्त को निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) की शक्तियाँ प्रदान करने के केंद्र सरकार के हालिया निर्णय की कड़े शब्दों में निंदा करती है। दिल्ली पुलिस ने एक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है तथा एनएसए के तहत निवारक निरोध की शक्तियों का दिल्ली पुलिस आयुक्त को प्रत्यायोजन (डेलीगेशन) परंपरागत रूप से प्रत्येक तीन माह में नवीनीकृत किया जाता है। फिर भी, मूल प्रश्न यह है कि केंद्र सरकार ऐसे उपाय का सहारा ले रही है जो पूरी तरह दमनकारी (ड्रेकोनियन) प्रकृति का है और जिसका इस्तेमाल दिल्ली में किसी भी नागरिक अथवा किसी भी जन-आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन के विरुद्ध किया जा सकता है। निवारक निरोध का उद्देश्य सामान्य नागरिक अशांति या सार्वजनिक प्रदर्शनों से निपटना नहीं है। यह एक असाधारण वैधानिक शक्ति है, जिसका प्रयोग केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध उत्पन्न होने वाले गंभीर खतरों की स्थिति में ही किया जाना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को इस प्रकार की व्यापक निरोधात्मक शक्तियों का नियमित और निरंतर प्रत्यायोजन संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त शांतिपूर्ण सभा, असहमति व्यक्त करने तथा सामूहिक संगठन एवं संघर्ष के अधिकार के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। अतः हम केंद्र सरकार से आग्रह करते हैं कि वह पुलिस को एनएसए के तहत लोगों को निवारक निरोध में रखने की शक्तियाँ नियमित रूप से प्रत्येक तीन माह में बढ़ाने की प्रथा तत्काल समाप्त करे।शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, छात्र कार्यकर्ताओं तथा नागरिक आंदोलनों के विरुद्ध एनएसए का प्रयोग करने से परहेज़ करे। एनएसए के तहत पहले से निवारक निरोध में रखे गए प्रत्येक व्यक्ति के मामले में संविधान के अनुच्छेद 22 के अंतर्गत उपलब्ध सभी संवैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे तथा पूरी पारदर्शिता बरते।
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