डॉ.तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु'
संपूर्ण संसार हमारे भारत
देश को महान कहता है
और हम सब भारतवासी
भी अपने भारत देश को
महान कहते हैं भारत देश
महान कहने के पीछे
का विशेष और गूढ़
अभिप्राय है जो सर्वविदित,
सर्वमान्य,सर्वव्यापी और
सर्वसम्मत है। क्योंकि ये
अपना भारत महान देश
सदियों,असंख्य सदियों से
ऋषियों,मुनियों,साधुओं,
संतों,पीरों,फ़क़ीरों,सूफ़ियों,
दरवेशों,दानिशवरों,कवियों
और शायरों की बहुत
ही उर्वरा और ज़रख़ेज़
सरज़मी रही है।
इस पावन और पवित्र
भूमि पर हर सदी हरेक
कालखंड मे वेद,पुराण,
शास्त्र,पांडुलिपि,ग्रंथ,
महाकाव्य,कविता,
कहानी,गीत,ग़ज़ल,नज्म,
और अफ़साने रचे गए हैं
रचे जा रहे हैं। अदब
और साहित्य के हवाले
से भारत देश हमेशा से
सर्वसमृद्ध और सर्वश्रेष्ठ
रहा है। सदियाँ बीती,
कालखंड बीते यहाँ का
अदब और साहित्य काल
को लाँघते हुए कालजयी
होता रहा। जो निस्संदेह
हम सब के लिए हर्ष और
गर्व की बात है।
प्राचीन काल से ही कवि
सम्मेलनों और मुशायरों
की रवायत मौजूद रही है
बस इसके रूप,रंग और
मुक़ाम वक़्त के साथ
बदलते रहे हैं। कविता और
शायरी अपने रवायती सफ़र
के साथ राज दरबारों,
शाही दरबारों मे कवि
बिहारी,कवि भूषण,तानसेन,
अमीर खुसरो,चंद्रबरदाई,
अब्दुल रहीम ख़ान ख़ाना,
मीर तक़ी मीर,मिर्ज़ा ग़ालिब,
मोमिन,दाग़,दर्द जैसे
शोरा से गुज़रते हुए आधुनिक
युग,स्वतंत्रता युग से
स्वर्णिम युग होते हुए
दौर-ए-हाज़िर तक
पहुंची है।
भारतीय साहित्यिक परंपरा
और क़दीमी अदबी
रवायत किताबों,मजमूनों,
रिसालों,पत्र,पत्रिकाओं
और अख़बारों तक महदूद
न होके अपने को पूर्ण
विस्तृत करते हुए अखिल
भारतीय कवि सम्मेलन
और कुलहिंद मुशायरों मे
समाहित करती है। अखिल
भारतीय कवि सम्मेलनों और
कुलहिंद मुशायरों की
परंपरा और रवायत मे आने
से साहित्य और अदब
का गुलशन बेइंतहा पल्लवित,
पुष्पित और सुगंधित
होता है जो दौर-ए-क़दीम से
दौर-ए-ज़दीद तलक
मुसल्सल ख़िरामाँ-ख़िरामाँ
गामज़न है।
साहित्य और अदब मे
जितनी भी सिन्फ़-ए-सुख़न
है उन सभी विधाओं मे
कविता और शायरी सबसे
ज़्यादा मुतास्सिर करनेवाली है।
दौर-ए-क़दीम से ही
कविता और शायरी अपने
वक़ार और मेयार का
लोहा मनवाने मे कामयाब
रही है बेशक कविता
और शायरी के जितने मुरीद
होंगे उतने अन्य विधा
के क़तई नहीं मिलेंगे।
क्योंकि कविता और शायरी
सीधे दिल से होते हुए रूह
मे उतरती है और हरेक
शख़्स को अपनी ज़िंदगी से
जुड़ी लगती है। इसका
लब्बोलुआब ये है कि कविता
और शायरी का दौर
कभी मद्धम नहीं पड़ा बल्कि
वक़्त के साथ और
वसी और तवील
होता चला गया।
वक़्त की अपनी गर्दिश
होती है वक़्त का अपना
तक़ाज़ा होता है वक़्त के
साथ कविता और शायरी
राज दरबारों,शाही दरबारों
से निकलकर अखिल
भारतीय कवि सम्मेलनों
और कुलहिंद मुशायरों मे
परिवर्तित हो गई जिससे
कविता और शायरी को
नई ऊँचाई,नई बुलंदी
मिली। अखिल भारतीय
कवि सम्मेलनों और कुलहिंद
मुशायरों की रवायत
मे एक शख़्सियत का कवियों
और शायरों से भी
ज़्यादा बड़ा मुक़ाम होता है
उसे हम सब बाअदब
नाज़ीम-ए-मुशायरा कहते हैं
जिसके ऊपर कवि
सम्मेलनों और मुशायरों को
सफल,मेयारी और
कामयाब बनाने की
ज़िम्मेदारी होती है।
माज़ी के कई पिछले दशकों
से अखिल भारतीय
कवि सम्मेलनों और कुलहिंद
मुशायरों की रवायत
बड़े शानदार,जानदार और
ऐतिहासिक तरीके से
सिलसिलेवार चली आ
रही है। जिसमें मुसल्सल
कवियों और शायरों के साथ,
साथ मंचों पे संचालन
करते नाज़ीम-ए-मुशायरा ने
अपने अंदाज़-ए-बयानी,
शीरी ज़बानी से मुशायरों को
ज़िंदगी,शायरों को ताबिंदगी
और अपने आपको
बेमिसाल शिनाख़्त दी है।
नाज़ीम-ए-मुशायरा एक
बाकमाल,हैरतअंगेज़
और सभी कवियों,शायरों
से आशना होता है। जो
हरेक कवि और शायर से
बख़ूबी वाक़िफ़ होता है।
यक़ीनन फ़न्न-ए-निज़ामत
बड़ा शख़्त और मुश्किल
हुनर है इसमे तो तबाआजमाई
बहुतों ने किया मगर
बात बन न सकी कहते हैं न
सबके लिए सब चीज़
नहीं बनी होती है किसी,
किसी को ही यह बहुत
ख़ास फ़न रब अता करता है।
कवि सम्मेलनों और
मुशायरों मे जिन संचालकों
और नाज़ीमों ने अबतक
अपना जलवा बिखेरा और
जो बिखरे रहे हैं उनके
स्माई गरामी ये हैं,डाॅ.
अशोक चक्रधर,डाॅ.कुमार
विश्वास,सर्वेश आस्थाना,
सुरेंद्र शर्मा,अरूण जेमिनी
,चिराग जैन,सलीम जाफ़री,
उमर कुरैशी,सकलैन
हैदर,मलिक़ज़ादा मंजूर,
अनवर जलालपुरी,फ़ाकिर
अदीब,मोईन शादाब,
हेलाल बदायूँनी,नदीम फ़र्रूख़,
और ग़ैबी जौनपुरी इत्यादि हैं।
अखिल भारतीय कवि
सम्मेलनों और कुलहिंद
मुशायरों मे मंच संचालन की
परंपरा,रवायत बहुत
ही समृद्ध है समय,समय पर
एक से बढ़कर एक
बाकमाल,माहिर संचालक
और नाज़ीम इस पवित्र
धरा पर पैदा होते रहे और
अपने कुशल संचालन
और निज़ामत से कवि
सम्मेलनों और मुशायरों की
दुनिया मे चार,चाँद लगाते रहे हैं।
ग्राम-अहिरौली,पोस्ट-आशापार,
तहसील-जलालपुर,और ज़िला-
अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश
में पैदा हुआ ऐसा ही
एक आला,बड़तर-ओ-बाला,
मुमताज़,संचालक,
नाज़ीम जिसे हम सब
डॉ.तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु'
के नाम से जानते,पहचानते हैं।
डॉ.तारकेश्वर मिश्र
'जिज्ञासु' बहुमुखी प्रतिभा के
धनी हैं पेशे से शिक्षक,
कवि और मोटिवेशनल
स्पीकर भी हैं। आपकी
लगभग आधा दर्जन तक
किताबें प्रकाशित हैं अभी
शीघ्र 'सफल मंच संचालन'
शीर्षक से एक नई किताब
प्रकाशित हुई है। इसके
साथ,साथ आप विभिन्न
साहित्यिक सम्मानों से
अलंकृत और विभूषित हो
चुके हैं। लेकिन बहुमुखी
प्रतिभा संपन्न शख़्स मे
एक विशेष ईश्वर प्रदत्त
प्रतिभा निहित होती है
जो ईश्वर प्रिय को देता है
जिसमे ओ निपुण,प्रवीण
और पारंगत होते हैं।
जो मौलिक रूप से ख़ूब
मुखरित होती है ऐसे ही
डाॅ.तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु'
मे मंच संचालन और
निज़ामत की प्रतिभा
कूट-कूट कर भरी हुई है।
सचमुच ही इसको संयोग
कहे या इत्तेफ़ाक़ जिस
अंबेडकर नगर की पवित्र
सरज़मीं पे मलिक़ज़ादा
मंजूर,अनवर जलालपुरी
जैसे अंतर्राष्ट्रीय नाजीम
पैदा हुए उसी पवित्र सरज़मीं
पे नाज़ीम डाॅ.तारकेश्वर
मिश्र 'जिज्ञासु' पैदा हुए जो
अपने शहर की विरासत
को बख़ूबी बड़ी शिद्दत से
निभा रहे हैं। मेरा भी यह
सौभाग्य रहा यूट्यूब,
फेसबुक,व्हाट्सएप,सोशल
मीडिया के माध्यम से डॉ.
तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु'
को जानते,पहचानते हुए
पिछले कई वर्षों से उनसे
मोबाइल के द्वारा गुफ़्तगू
होती रही। दिल मे आरजू
थी मिलने व सुनने की जो
पिछले महीने आज़मगढ़
के एक साहित्यिक कार्यक्रम
में उनके द्वारा किये
ऐतिहासिक मंच संचालन
के साथ पूरी हुई।
आज़मगढ़ के साहित्यिक
कार्यक्रम मे मुख़ातिब
होकर मैंने देखा कि ओ
कमाल के नाज़ीम हैं उनके
निज़ामत मे कशिश,लचक,
खुशबू है,बेशुमार शेरों का
लबो पे गुलदस्ता है,नज़ाक़त,
नफ़ासत,लियाक़त,है,
अंदाज़-ए-बयानी है,शीरी
ज़बानी है,हिब्बुल वतनी
की शनाशाई है,क़ौमी
यकजहती की रहनुमाई है,
तहज़ीब-ओ-तमद्दुन की
रानाई है,अमन-ओ-शुकुन
की परचम कुशाई है,कवियों,
शायरों की हौसलामंदी
है,हरेक शख़्स की दिलपसंदी
है,श्रोता,शामयीन को
सम्हालने का हुनर है,ये हुनर
अपने आप मे गौहर है।
बिलयक़ी,बिलाशुब्हा,
निस्संदेह और निश्चित रूप से
मैं शायर एवं गीतकार
आदित्य आज़मी कह रहा हूँ
कि डॉ.तारकेश्वर मिश्र 'जिज्ञासु'
निज़ामत की दुनिया
का एक उभरता हुआ
रौशन सितारा हैं।
मेरे परम प्रिय डाॅ.तारकेश्वर
मिश्र 'जिज्ञासु' जी आप
मे बड़ी ही संभावनायें निहित
हैं मैं आपके उज्जवल
भविष्य की ईश्वर से कामना
करते हुए आपको हार्दिक
बधाई एवं मंगल शुभकामनाएं
प्रेषित करता हूँ।
इख्त़िताम मे एक शेर
से बात ख़त्म करता हूँ।
लहजा है ऐसा जैसे सुब्ह
की खुशबू अजान दे,
ओ जब बोलता है तो पत्थर
मुख़ातिब होता है।
आदित्य आज़मी
शायर एवं गीतकार
आज़मगढ़ उत्तर प्रदेश
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