गणेश उत्सव के इस पावन अवसर पर मैं गणपति बप्पा से केवल अपने विघ्न दूर करने की प्रार्थना नहीं करना चाहती, बल्कि उनके पूरे परिवार से जीवन जीने का एक बहुत सुंदर पाठ सीखना चाहती हूँ।
जरा गणेश जी के परिवार को देखिए।
भगवान शिव—शिव शब्द का अर्थ ही है कल्याणकारी, मंगलमय।
वे हमें त्याग, वैराग्य और कल्याण का संदेश देते हैं।
माता पार्वती—शक्ति का स्वरूप हैं।
जहाँ शिव हैं, वहाँ शक्ति है; और शिव और शक्ति मिलकर ही सृष्टि को पूर्णता देते हैं।
और फिर उनके पुत्र
गणेश जी, बुद्धि और विवेक के प्रतीक।
कार्तिकेय जी, साहस और पराक्रम के प्रतीक।
लेकिन इस परिवार की सबसे अद्भुत बात क्या है?
आइए उनके वाहनों को देखिए।
गणेश जी का वाहन मूषक,
कार्तिकेय जी का वाहन मोर,
भगवान शिव के गले में सर्प और उनका वाहन नंदी,
और माता पार्वती का वाहन सिंह।
कितना अद्भुत परिवार है!
जहाँ हमें हर तरफ स्वाभाविक विरोध दिखाई देता है, वहाँ परिवार में प्रेम और समरसता दिखाई देती है।
मोर और मूषक—एक-दूसरे के स्वाभाविक साथी नहीं।
सर्प और मूषक—विरोध का संबंध।
सिंह और नंदी—एक शिकारी, दूसरा शांत और सरल।
फिर भी सभी एक ही परिवार में हैं।
क्यों?
क्योंकि जहाँ प्रेम होता है, वहाँ विरोध छोटा हो जाता है और संबंध बड़ा।
यही गणेश परिवार हमें सिखाता है—
परिवार में सबका स्वभाव एक जैसा होना जरूरी नहीं,
दिलों में प्रेम होना जरूरी है।
आज हमारे घरों में भी छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव हो जाता है।
विचार अलग हुए, पसंद अलग हुई, अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं और हम रिश्तों से दूर होने लगते हैं।
लेकिन शिव-पार्वती का परिवार जैसे हमें कहता है ,
“भिन्नता को स्वीकार करो, प्रेम को मत खोओ।”
और गणेश जी के जीवन की एक बहुत सुंदर कथा भी हमें यही सिखाती है।
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने गणेश जी और कार्तिकेय जी से कहा कि जो तीनों लोकों की परिक्रमा करके सबसे पहले वापस आएगा, वही विजेता होगा।
कार्तिकेय जी अपने मोर पर बैठकर तुरंत निकल पड़े।
गणेश जी ने अपने छोटे-से मूषक को देखा।
उन्होंने सोचा—मेरे लिए इतनी लंबी यात्रा करना आसान नहीं होगा।
तब गणेश जी ने अपने माता-पिता—शिव और पार्वती—की तीन परिक्रमा की और कहा—
“मेरे लिए मेरे माता-पिता ही तीनों लोक हैं।”
कितनी गहरी बात है!
बुद्धि केवल तेजी से आगे बढ़ जाने का नाम नहीं है।
बुद्धि यह समझने का नाम भी है कि जीवन में वास्तव में सबसे मूल्यवान क्या है।
आज हम पूरी दुनिया घूम रहे हैं, बहुत कुछ पा रहे हैं, बहुत आगे बढ़ रहे हैं; लेकिन कभी-कभी अपने ही घर के लोगों से दूर होते जा रहे हैं।
गणेश जी हमें याद दिलाते हैं—
दुनिया जीतने से पहले अपने रिश्ते मत हारिए।
और यहाँ से यह कथा हमें आध्यात्मिक जीवन की ओर भी ले जाती है।
हम त्याग करते हैं, तप करते हैं, पूजा करते हैं, साधना करते हैं।
लेकिन यदि हमारे भीतर प्रेम, करुणा, क्षमा और मैत्री नहीं है, तो हमारी साधना अभी अधूरी है।
प्रेम है तो त्याग में मिठास है।
प्रेम है तो क्षमा सहज है।
प्रेम है तो सेवा आनंद बन जाती है।
प्रेम है तो घर परिवार स्वर्ग बन जाता है।
इसीलिए मेरे लिए गणेश जी का परिवार केवल एक धार्मिक कथा नहीं है, बल्कि पूरा जीवन-दर्शन है।
शिव हमें कल्याण सिखाते हैं,
पार्वती हमें शक्ति देती हैं,
गणेश हमें बुद्धि देते हैं,
कार्तिकेय हमें साहस देते हैं—
और पूरा परिवार हमें प्रेम और समरसता का पाठ पढ़ाता है।
आज गणपति बप्पा से मेरी प्रार्थना है—
हे विघ्नहर्ता,
हमारे घरों के केवल बाहरी विघ्न दूर मत करना,
हमारे मन के अहंकार, क्रोध और कटुता के विघ्न भी दूर करना।
हमें ऐसा हृदय देना कि हम अपने से अलग सोचने वाले को भी स्वीकार कर सकें।
हमारे रिश्तों में प्रेम रहे,
बड़ों के प्रति सम्मान रहे,
छोटों के प्रति स्नेह रहे,
और मन में सभी के लिए मैत्री रहे।
क्योंकि अंत में जीवन में हमने कितना पाया, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है;
हमने कितने दिलों में प्रेम छोड़ा—शायद यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
और मेरी दृष्टि में गणपति बप्पा का सबसे सुंदर संदेश यही है— “जहाँ प्रेम है, वहाँ विरोध भी समरसता बन जाता है।
जहाँ प्रेम है, वहाँ त्याग साधना बन जाता है।
और जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ केवल त्याग और तप भी आत्मा को पूर्ण शांति नहीं दे सकते।”
हे गणपति बप्पा,
मेरे भीतर प्रेम इतना भर देना कि
मैं हर रिश्ते में अपना देख सकूँ,
हर जीव में जीवन देख सकूँ,
और हर परिस्थिति में कल्याण का मार्ग खोज सकूँ।
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