कुछ दिन पहले मैं अचानक अपनी एक प्रिय सखी के घर मिलने चली गई। हम दोनों परिवार वर्षों से एक-दूसरे को जानते हैं, इसलिए औपचारिकता का प्रश्न ही नहीं था।
मैंने देखा कि वह और उनके पति किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। मेरी सखी कोई बात कहती और उनके पति तुरंत उसकी बात काट देते। उसकी लगभग हर राय का विरोध हो रहा था। कुछ देर तक उसने धैर्य रखा, फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ, लेकिन भीतर से आहत होकर बोली
"आपको जो ठीक लगे, वही कर लीजिए। मेरा काम था समझाना, मैंने समझा दिया।"
उसके शब्दों में शिकायत कम और हार अधिक थी।
उस दिन घर से लौटते समय मन में एक ही प्रश्न बार-बार उठता रहा :
आख़िर ऐसा क्यों होता है कि जिन लोगों को हम सबसे अधिक अपना मानते हैं, उनकी बात ही सबसे अंत में सुनते हैं?
पति-पत्नी हों, माता-पिता हों, भाई-बहन हों या परिवार का कोई अन्य सदस्य—जब वे हमें कोई सलाह देते हैं, तो हम उसमें कमियाँ खोजने लगते हैं। लेकिन वही बात यदि कोई मित्र, पड़ोसी या बाहरी व्यक्ति कह दे, तो वह हमें बहुत समझदारी भरी लगने लगती है।
क्या इसलिए कि अपने लोग हमेशा हमारे साथ रहते हैं और हम उन्हें "टेकन फॉर ग्रांटेड" लेने लगते हैं?
सच तो यह हैं कि दुनिया में सबसे निस्वार्थ सलाह वही देता है, जिसका दिल हमारे लिए धड़कता है। बाहर वाले सलाह तो दे सकते हैं, लेकिन उसके परिणामों की जिम्मेदारी नहीं उठाते। यदि बात गलत हो जाए तो सहज कह देंगे—"हमने तो सिर्फ राय दी थी, मानना या न मानना आपका निर्णय था।"
लेकिन परिवार का सदस्य ऐसा नहीं कह सकता, क्योंकि उसका सुख-दुःख हमारे जीवन से जुड़ा होता है।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब हम दूसरों के सामने अपने ही जीवनसाथी की बात काट देते हैं, उसकी राय को महत्व नहीं देते या उसका मज़ाक बना देते हैं। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि शब्दों के घाव दिखाई नहीं देते, लेकिन वे बहुत गहरे होते हैं।
बाहर बैठे लोग भले मुस्कुरा दें, लेकिन मन ही मन यही सोचते हैं—"जो एक-दूसरे का सम्मान नहीं कर सकते, वे साथ कैसे निभाएँगे?"
इसके विपरीत कुछ घर ऐसे भी होते हैं, जहाँ पति-पत्नी बिना अधिक शब्दों के भी एक-दूसरे का मन समझ लेते हैं। वे जानते हैं कि हर बार मैं ही सही नहीं हो सकता। वे एक-दूसरे को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं, एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं। यही परिपक्वता रिश्तों को मजबूत बनाती है।
हर इंसान चाहता हैं कि उसकी बात सुनी जाए, उसकी राय का सम्मान हो, उसके योगदान की कद्र हो। विशेषकर उस घर में, जिसके लिए उसने अपना समय, श्रम, प्रेम और पूरा जीवन समर्पित कर दिया हो।
जब किसी को बार-बार यह महसूस कराया जाता है कि उसकी बात का कोई मूल्य नहीं है, उसकी राय का कोई महत्व नहीं है, तब वह धीरे-धीरे भीतर से टूटने लगता है। उपेक्षा का दर्द दिखाई नहीं देता, लेकिन यह इंसान को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। कई बार यही उपेक्षा उसे अवसाद और निराशा की ओर भी धकेल देती है।
आज एक और समस्या तेजी से बढ़ रही है—"टेकन फॉर ग्रांटेड"।
घर का जो सदस्य सबसे अधिक करता है, उसी से सबसे अधिक अपेक्षाएँ रखी जाती हैं। चाहे माता-पिता हों, बड़े भाई-भाभी हों, जेठ-जेठानी हों या पति-पत्नी—जो जिम्मेदार होता है, उससे सबको उम्मीद रहती हैं कि वह करता ही रहेगा। लेकिन उसके लिए हम क्या कर सकते हैं, यह सोचने का समय बहुत कम लोग निकालते हैं।
रिश्ते केवल लेने से नहीं चलते, देने से भी चलते हैं। सम्मान केवल पाने की चीज़ नहीं, देने की आदत भी है।
आजकल कुछ लोग बाहर की दुनिया में आदर्श पति-पत्नी होने का ऐसा प्रदर्शन करते हैं कि लगता है उनसे अधिक प्रेम करने वाला कोई नहीं। लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर वही रिश्ता तानों, कटु शब्दों और अपमान से भर जाता है। सुबह की चाय के साथ कभी पत्नी की आँखों से आँसू बहते हैं, तो कभी पति चुपचाप अपनी पीड़ा भीतर ही दबा लेता है।
यदि सचमुच एक सुखी परिवार बनाना है, तो सबसे पहले बाहर वालों से अधिक अपने जीवनसाथी को महत्व देना होगा। क्योंकि अंत में जीवन की हर कठिन राह पर साथ मित्र नहीं, समाज नहीं, बल्कि पति-पत्नी ही निभाते हैं। बच्चे भी एक दिन अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं, लेकिन जीवनसाथी का साथ जीवन के अंतिम पड़ाव तक बना रहता है।
मुझे अपना बचपन याद आता है।
मैंने अपने माता-पिता को कभी हमारे सामने एक-दूसरे का अपमान करते नहीं देखा। मतभेद अवश्य होते होंगे, लेकिन मनभेद कभी नहीं देखा , उन्होंने अपने मतभेद को कभी बच्चों के सामने तमाशा नहीं बनने दिया। यदि किसी से भूल हो जाती, तो "सॉरी" कहने में किसी का अहंकार आड़े नहीं आता था।
शायद यही कारण था कि हमारा बचपन इतना तनावमुक्त और सुखद था। संयुक्त परिवार में रहते हुए हमें हर ओर अपनापन, सुरक्षा और स्नेह का अनुभव होता था। ऐसा लगता था कि पूरा परिवार हमारी ताकत है, हमारी ढाल है।
आज भी मन कहता है—काश! हर घर में फिर वही अपनापन लौट आए। चाहे संयुक्त परिवार हो या एकल परिवार, यदि संवाद रहेगा, सम्मान रहेगा, संवेदनशीलता रहेगी, तो हर घर फिर से मुस्कुराने लगेगा।
याद रखिए :
रिश्तों को सबसे अधिक प्रेम नहीं, सम्मान जीवित रखता है।
जिस दिन हम बाहर वालों से पहले अपनों की बात सुनना सीख जाएँगे, उसी दिन हमारे घरों की आधी समस्याएँ अपने आप समाप्त हो जाएँगी।
क्योंकि जो व्यक्ति आपके सुख-दुःख में आपके साथ खड़ा रहता है, उसकी सलाह केवल शब्द नहीं होती, उसमें उसका प्रेम, अनुभव और आपका भविष्य छिपा होता है। इसलिए अपनों की बात को सबसे अंत में नहीं, सबसे पहले सुनिए। वहीं से रिश्तों की मिठास और जीवन की सच्ची खुशियाँ शुरू होती हैं।
अपनों की बातों में अनुभव का सार होता है,
हर शब्द में छिपा सच्चा प्यार होता है।
जो बाहर वालों की आवाज़ में अपने खो देते हैं,
अक्सर वे रिश्तों का सबसे अनमोल उपहार खो देते हैं।
रिश्ते तब नहीं टूटते जब मतभेद होते हैं,
रिश्ते तब टूटते हैं जब सम्मान समाप्त हो जाता है।
इसलिए अपनों की बात सुनिए, समझिए और उन्हें महसूस कराइए—
कि वे केवल आपके परिवार का हिस्सा नहीं,
आपके जीवन का सबसे बड़ा सहारा हैं।
0 Comments