शिरडी, अहिल्यानगर। भारतीय जीवन-दर्शन, सनातन धर्म की मूल संकल्पना “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे जनाः सुखिनः भवन्तु” की उदात्त भावना के प्रसार हेतु “मानव बन जाए जग सारा, यह पावन संकल्प हमारा” के सार्थक उद्देश्य को लेकर वर्ष 2020 से कार्यरत अंतरराष्ट्रीय संस्था हिन्दी साहित्य भारती का तीन दिवसीय वार्षिक अधिवेशन शिरडी स्थित साईं बाबा सांस्कृतिक संकुल के भव्य सभागार में विगत दिनों सम्पन्न हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में देशभर के विभिन्न राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों से दो सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता दर्ज कराई। 15 से अधिक देशों के पदाधिकारी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े, जबकि ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधि श्री चार्ल्स एस. थॉमसन ने भौतिक रूप से उपस्थित होकर सहभागिता की।तीन दिवसीय आयोजन में सात विविध सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें सदस्यता एवं सांगठनिक समीक्षा, युवा शक्ति और सनातन धर्म, महिला सशक्तिकरण और भारतीय दृष्टिकोण, भारतीय सांस्कृतिक चेतना का वैश्विक आयाम तथा संस्था के विविध आयामों एवं प्रकोष्ठों की समीक्षा पर क्रमशः विस्तृत विमर्श सम्पन्न हुआ। अधिवेशन में सर्वसम्मति से तीन महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित कर भारत सरकार को प्रेषित करने का अनुमोदन किया गया। पहले प्रस्ताव के अंतर्गत “शिक्षा का माध्यम केवल भारतीय भाषाएँ हों” विषय पर तथ्यपरक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। दूसरे प्रस्ताव “साम्प्रदायिक शिक्षा भारत के लिए अभिशाप” के अंतर्गत मिशनरियों और मदरसों में दी जा रही साम्प्रदायिक एवं विभेदीकरणपरक शिक्षा को निषिद्ध किए जाने की मांग की गई। तीसरे महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव में देश में नैतिक एवं सनातन मूल्यों की पक्षधर गुरुकुल शिक्षा पद्धति को सम्पूर्ण राष्ट्र में कार्यान्वित किए जाने की मांग रखी गई।
अधिवेशन के उद्घाटन सत्र में मुख्य संबोधन सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी एवं गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. भाग्येश झा ने किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में कम्प्यूटर चिप को माँ सरस्वती के आधुनिक स्वरूप की भाँति अंगीकार करना चाहिए। भारतीय भाषाओं की संस्थापना हमारे डी.एन.ए. में होनी चाहिए। हस्ताक्षर अपनी मातृभाषा में होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यंत्र-प्रज्ञा को चैतन्य-प्रज्ञा पर हावी नहीं होने देना है। मुख्य अतिथि डॉ. अतुल कोठारी, राष्ट्रीय सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, ने अपने सारगर्भित संबोधन में कहा कि आज विश्व एक चौराहे पर खड़ा है। 85 से अधिक देश तेल संकट और अन्य कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। भौतिक विकास तो बढ़ रहा है, पर समस्याएँ भी मुँह बाए खड़ी हैं। आज दुनिया भारत की ओर आशाभरी निगाहों से देख रही है, ताकि वह समाप्त होते मार्क्सवाद और पनपते पूँजीवाद के बीच भारतीय ज्ञान-परंपरा के आदर्श मॉडल को आत्मसात कर शांति और सौहार्द को चरितार्थ कर सके। उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व शिक्षा एवं कृषि मंत्री तथा हिन्दी साहित्य भारती के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवीन्द्र शुक्ल ने कहा कि भारतीय सनातन धर्म ही निखिल विश्व में वास्तविक धर्म है, बाकी सभी पंथ या रिलीजन हैं। दुनिया के सारे चिंतन एकांगी हैं, जबकि भारतीय सांस्कृतिक सोच व्यापक, कल्याणकारी और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओतप्रोत है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा और समर्पण की नगरी शिरडी की पावन भूमि पर हिन्दी साहित्य भारती ने नवजागरण का शंखनाद किया है। डॉ. शुक्ल ने कहा कि भारत का आशय है — ‘भा’ अर्थात् ज्ञान और ‘रत’ अर्थात् उसमें निरंतर संलग्न। देश का नाम भारत होना चाहिए, न कि इंडिया। इसी क्रम में ओम् उच्चारण के ध्वनि-मत से यह संकल्प भी पारित किया गया कि देश का नाम केवल भारत हो। इस मांग को लेकर देशभर के प्रबुद्ध वर्ग से 21,000 संकल्प-पत्र हस्ताक्षरित करवाकर शीघ्र ही राष्ट्रपति महोदया को सौंपे जाने का प्रस्ताव रखा गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मी नारायण भाला ने संगठन-विस्तार के कौशल पर विस्तारपूर्वक अपने सूत्र प्रस्तुत किए।
तीनों दिन पूर्वनिर्धारित सत्रों के समापन के उपरान्त आयोजित काव्य-मंच में गणमान्य एवं सुस्थापित कवियों-कवयित्रियों ने ओजस्वी काव्य-पाठ कर वातावरण को साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।
अधिवेशन के तीसरे दिन असम राज्य के राज्यपाल लक्ष्मण आचार्य ने ऑनलाइन जुड़कर अपना समसामयिक संभाषण प्रस्तुत किया, जिसे उपस्थित जनसमूह ने अत्यंत सराहा। नेपाल, कनाडा, ब्रिटेन, श्रीलंका, तंजानिया, फिजी, भूटान, ताजिकिस्तान, जर्मनी आदि 15 से अधिक देशों से ऑनलाइन जुड़े पदाधिकारियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सभी ने एकमत से स्वीकार किया कि मौजूदा वैश्विक झंझावातों के विषम काल में भारतीय सनातन मूल्य ही विश्व-शांति और सौहार्द का स्थायी समाधान बन सकने में सक्षम हैं। भारतीय सांस्कृतिक चेतना का यही वैश्विक आयाम है।
विदेशी प्रतिनिधियों ने यह मत व्यक्त किया कि जहाँ पाश्चात्य दुनिया विश्व को बाजार के रूप में देखती है, वहीं भारतीय चिंतन सम्पूर्ण विश्व को परिवार के रूप में देखता है। यही भारतीय चिंतन-परंपरा की विशिष्टता है। हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय विमर्श हेतु राष्ट्रभाषा के रूप में वैधानिक दर्जा प्रदान करने की पुरजोर मांग करते हुए औपचारिक प्रस्ताव भी पारित किया गया। अधिवेशन में यह भी माना गया कि प्रवासी भारतीय संबंधित देशों में भारतीय संस्कृति के सांस्कृतिक राजदूत हैं। फिजी में विद्यमान लगभग 2000 रामायण मंडलियाँ और गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस वहाँ के समाज को भारतीय जीवन-दर्शन से जोड़े रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हिन्दी साहित्य भारती का सूत्र-वाक्य “मानव बन जाए जग सारा, यह पावन संकल्प हमारा” वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का जीवंत आधार है। तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में संस्था के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं ख्यातिलब्ध साहित्यकार आचार्य देवेंद्र देव, मुंबई विश्वविद्यालय के डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, राम निवास शुक्ल, वागीश दिनकर, प्रोफेसर दयानंद तिवारी, डॉ. रमा शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र के अपर पुलिस महानिदेशक कृष्ण प्रकाश, प्रोफेसर बलभद्र त्रिपाठी, प्रोफेसर विनोद मिश्र, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, तथा डॉ. आलोक सिंह, मेघालय विश्वविद्यालय, ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर हिन्दी साहित्य भारती की विवरणात्मक परिचायिका का भी विमोचन किया गया। सभी आगंतुक अतिथियों का स्वागत शाल, स्मृति-चिह्न, संस्था के अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ से किया गया। अधिवेशन में आए समस्त प्रतिभागियों को भी स्मृति-चिह्न और प्रमाणपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय संस्था हिन्दी साहित्य भारती के केन्द्रीय मीडिया संयोजक आनन्द उपाध्याय ने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से यह जानकारी दी। भारतीय जीवन-दर्शन, सनातन धर्म की मूल संकल्पना “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे जनाः सुखिनः भवन्तु” की उदात्त भावना के प्रसार हेतु “मानव बन जाए जग सारा, यह पावन संकल्प हमारा” के सार्थक उद्देश्य को लेकर वर्ष 2020 से कार्यरत अंतरराष्ट्रीय संस्था हिन्दी साहित्य भारती का तीन दिवसीय वार्षिक अधिवेशन शिरडी स्थित साईं बाबा सांस्कृतिक संकुल के भव्य सभागार में विगत दिनों सम्पन्न हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में देशभर के विभिन्न राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों से दो सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता दर्ज कराई। 15 से अधिक देशों के पदाधिकारी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े, जबकि ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधि चार्ल्स एस. थॉमसन ने भौतिक रूप से उपस्थित होकर सहभागिता की। तीन दिवसीय आयोजन में सात विविध सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें सदस्यता एवं सांगठनिक समीक्षा, युवा शक्ति और सनातन धर्म, महिला सशक्तिकरण और भारतीय दृष्टिकोण, भारतीय सांस्कृतिक चेतना का वैश्विक आयाम तथा संस्था के विविध आयामों एवं प्रकोष्ठों की समीक्षा पर क्रमशः विस्तृत विमर्श सम्पन्न हुआ। अधिवेशन में सर्वसम्मति से तीन महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित कर भारत सरकार को प्रेषित करने का अनुमोदन किया गया। पहले प्रस्ताव के अंतर्गत “शिक्षा का माध्यम केवल भारतीय भाषाएँ हों” विषय पर तथ्यपरक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। दूसरे प्रस्ताव “साम्प्रदायिक शिक्षा भारत के लिए अभिशाप” के अंतर्गत मिशनरियों और मदरसों में दी जा रही साम्प्रदायिक एवं विभेदीकरणपरक शिक्षा को निषिद्ध किए जाने की मांग की गई। तीसरे महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव में देश में नैतिक एवं सनातन मूल्यों की पक्षधर गुरुकुल शिक्षा पद्धति को सम्पूर्ण राष्ट्र में कार्यान्वित किए जाने की मांग रखी गई।
अधिवेशन के उद्घाटन सत्र में मुख्य संबोधन सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी एवं गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. भाग्येश झा ने किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में कम्प्यूटर चिप को माँ सरस्वती के आधुनिक स्वरूप की भाँति अंगीकार करना चाहिए। भारतीय भाषाओं की संस्थापना हमारे डी.एन.ए. में होनी चाहिए। हस्ताक्षर अपनी मातृभाषा में होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यंत्र-प्रज्ञा को चैतन्य-प्रज्ञा पर हावी नहीं होने देना है। मुख्य अतिथि डॉ. अतुलभाई कोठारी, राष्ट्रीय सचिव, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, ने अपने सारगर्भित संबोधन में कहा कि आज विश्व एक चौराहे पर खड़ा है। 85 से अधिक देश तेल संकट और अन्य कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। भौतिक विकास तो बढ़ रहा है, पर समस्याएँ भी मुँह बाए खड़ी हैं। आज दुनिया भारत की ओर आशाभरी निगाहों से देख रही है, ताकि वह समाप्त होते मार्क्सवाद और पनपते पूँजीवाद के बीच भारतीय ज्ञान-परंपरा के आदर्श मॉडल को आत्मसात कर शांति और सौहार्द को चरितार्थ कर सके। उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व शिक्षा एवं कृषि मंत्री तथा हिन्दी साहित्य भारती के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवीन्द्र शुक्ल ने कहा कि भारतीय सनातन धर्म ही निखिल विश्व में वास्तविक धर्म है, बाकी सभी पंथ या रिलीजन हैं। दुनिया के सारे चिंतन एकांगी हैं, जबकि भारतीय सांस्कृतिक सोच व्यापक, कल्याणकारी और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओतप्रोत है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा और समर्पण की नगरी शिरडी की पावन भूमि पर हिन्दी साहित्य भारती ने नवजागरण का शंखनाद किया है। डॉ. शुक्ल ने कहा कि भारत का आशय है — ‘भा’ अर्थात् ज्ञान और ‘रत’ अर्थात् उसमें निरंतर संलग्न। देश का नाम भारत होना चाहिए, न कि इंडिया। इसी क्रम में ओम् उच्चारण के ध्वनि-मत से यह संकल्प भी पारित किया गया कि देश का नाम केवल भारत हो। इस मांग को लेकर देशभर के प्रबुद्ध वर्ग से 21,000 संकल्प-पत्र हस्ताक्षरित करवाकर शीघ्र ही राष्ट्रपति महोदया को सौंपे जाने का प्रस्ताव रखा गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मी नारायण भाला ने संगठन-विस्तार के कौशल पर विस्तारपूर्वक अपने सूत्र प्रस्तुत किए। तीनों दिन पूर्वनिर्धारित सत्रों के समापन के उपरान्त आयोजित काव्य-मंच में गणमान्य एवं सुस्थापित कवियों-कवयित्रियों ने ओजस्वी काव्य-पाठ कर वातावरण को साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।
अधिवेशन के तीसरे दिन असम राज्य के राज्यपाल लक्ष्मण आचार्य ने ऑनलाइन जुड़कर अपना समसामयिक संभाषण प्रस्तुत किया, जिसे उपस्थित जनसमूह ने अत्यंत सराहा। नेपाल, कनाडा, ब्रिटेन, श्रीलंका, तंजानिया, फिजी, भूटान, ताजिकिस्तान, जर्मनी आदि 15 से अधिक देशों से ऑनलाइन जुड़े पदाधिकारियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सभी ने एकमत से स्वीकार किया कि मौजूदा वैश्विक झंझावातों के विषम काल में भारतीय सनातन मूल्य ही विश्व-शांति और सौहार्द का स्थायी समाधान बन सकने में सक्षम हैं। भारतीय सांस्कृतिक चेतना का यही वैश्विक आयाम है।
विदेशी प्रतिनिधियों ने यह मत व्यक्त किया कि जहाँ पाश्चात्य दुनिया विश्व को बाजार के रूप में देखती है, वहीं भारतीय चिंतन सम्पूर्ण विश्व को परिवार के रूप में देखता है। यही भारतीय चिंतन-परंपरा की विशिष्टता है। हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय विमर्श हेतु राष्ट्रभाषा के रूप में वैधानिक दर्जा प्रदान करने की पुरजोर मांग करते हुए औपचारिक प्रस्ताव भी पारित किया गया। अधिवेशन में यह भी माना गया कि प्रवासी भारतीय संबंधित देशों में भारतीय संस्कृति के सांस्कृतिक राजदूत हैं। फिजी में विद्यमान लगभग 2000 रामायण मंडलियाँ और गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस वहाँ के समाज को भारतीय जीवन-दर्शन से जोड़े रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हिन्दी साहित्य भारती का सूत्र-वाक्य “मानव बन जाए जग सारा, यह पावन संकल्प हमारा” वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का जीवंत आधार है। तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में संस्था के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं ख्यातिलब्ध साहित्यकार आचार्य देवेंद्र देव, मुंबई विश्वविद्यालय के डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, राम निवास शुक्ल, वागीश दिनकर, प्रोफेसर दयानंद तिवारी, डॉ. रमा शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र के अपर पुलिस महानिदेशक श्री कृष्ण प्रकाश, प्रोफेसर बलभद्र त्रिपाठी, प्रोफेसर विनोद मिश्र, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, तथा डॉ. आलोक सिंह, मेघालय विश्वविद्यालय, ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर हिन्दी साहित्य भारती की विवरणात्मक परिचायिका का भी विमोचन किया गया। सभी आगंतुक अतिथियों का स्वागत शाल, स्मृति-चिह्न, संस्था के अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ से किया गया। अधिवेशन में आए समस्त प्रतिभागियों को भी स्मृति-चिह्न और प्रमाणपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।अंतरराष्ट्रीय संस्था हिन्दी साहित्य भारती के केन्द्रीय मीडिया संयोजक आनन्द उपाध्याय ने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से यह जानकारी दी।
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